भाइयों को खो करके राखियां भी मौत वाला फंदा बन शत्रु के गले में पड़ जाता है हाथ मेहंदी रचाए अंतिम सलामी दे के सरहद पर कहीं सिंदूर लड़ जाता है
लाल चुनरिया शस्त्र हाथ में नई सदी का भारत है, कविता बतलाएगी तुमको क्या सिंदूर की ताकत है
बिना शास्त्र बिना अस्त्र रावण का दंभ त्रस्त भारतीय नारी बन शक्ति खाक कर दी सोने वाली नगरी को धूल के समान मान राक्षसीय नगरी की बेल खाक कर दी
सीता मां के सिंदूर की शक्ति थी जो पति व्रत वाले धर्म की ऊंची शान कर दी उन की कृपा कटाक्ष वाली अग्नि धारण करके बजरंगी ने तो पूरी लंका राख कर दी
यम से भी टकरा जाए जो ऐसे अद्भुत हिम्मत है कविता बतलाएगी तुमको क्या सिंदूर की ताकत है
शक्ति की उपासना का देश जहां छोटी मनु काली का सामान खुद को संवार लेती है पति स्वर्ग लोक को सिद्धारे किंतु टूटी नहीं दर्द के गुबार को स्वयं मार लेती है झलकारी काशी में सुंदर को साथ लेकर फैसला वो युद्ध हेतु आर पार लेती है रानी लक्ष्मी बाई मातृभूमि हेतु चूड़ियां उतार तलवार धार लेती है
दुर्गा बनकर टूट पड़ी वो अरिदल की फिर सामत है कविता बतलाएगी तुमको क्या सिंदूर की ताकत है
यौवन अगर अवरोध शौर्य का बने तो रंग रूप को दो टुकड़ों में बांट देती है काजल को पूछ कर बिंदिया को नोच कर अपने श्रृंगार को स्वयं छठ देता है राजपूती आन बान शान मिटने ना पाए कायर बने जो उनको भी डांट देती है रूप आसक्ति पति रण छोड़ ना दे इसलिए हांडी वाली रानी सर अपना उतार देती है
युद्ध क्षेत्र हो कर्म क्षेत्र हो विजई होना आदत है कविता बतलाएगी तुमको क्या सिंदूर की ताकत है ।
जिसको पिलाया दूध उसका ही खून देख लोरिया की बद्दुआ का शूल गढ़ जाता है
पापा तुम पर है गर्व आंसुओं में बोलकर बेटियों का बचपन भी झगड़ जाता है भाइयों को खो करके रखियो भी मौत वाला फंदा बना शत्रु के गले में पड़ जाता है हाथ मेहंदी रचाए अंतिम सलामी दे के सरहद पर कहीं सिंदूर लड़ जाता है
जिसको तुम सिंगार समझते दुश्मन की वह आफत है कविता बतलाएगी तुमको क्या सिंदूर की ताकत है आपको क्या सिंदूर की ताकत है |
राम मंदिर चंदा चोरी पर कविता तिवारी की कविता
प्राण प्रतिष्ठा की खुशियां बासी अखबार बना डाला,
भक्तों के विश्वास को शायद तार तार बना डाला,
राम लला के मंदिर में चोरी करने वालों ने
कारसेवकों के बलिदानों का व्यापार बना डाला।
पाप के पंच जिनको घेरे हैं
उनके जीवन में बस अंधेरे हैं,
राम का नाम जप ऐ मूरख
राम मेरे हैं राम तेरे हैं
राम राज्य क्यों जरूरी है
मर्यादा का मान बढ़ाने , शुचिता जन जन तक पहुंचाने
अहंकार को धूल चटाने आदर्शों का पाठ पढ़ाने,
ज्ञानी बुनकर तानें वाने, बिखरी मानवता अपनाने
दीन दुखी की लाज बचाने , करने होंगे सफल बहाने
सुनलो भारत भाग्य विधाता लखन लाल के अग्रज भ्राता
रवि कुलभूषण दशरथ नंदन सरयु का तट तुम्हे बुलाता
दावानल गिर सैन्य बनाकर जोड़ रहा है कुत्सित नाता
उनके यही कुकृत्य देखकर चीख रही है भारतमाता।
अवध पधारे बिना तुम्हारे संकल्पना अधूरी है
पुनः शिला बन गई अहिल्या यह कैसी मजबूरी है
कुछ काल्पनिक बताते तुमको अतः बढ़ रही दूरी है
स्वर्णिम प्रात संदेशा सुनकर हुई शाम सिन्दूरी है
क्या तुमने संताप सहे बतलाना बहुत जरूरी है
इसीलिए हे राम धरा पर आना बहुत जरूरी है ।
जाति पंथ कुनबे उभरे हैं अगड़े पिछड़े के झगड़े हैं ।
चौराहों से गलियारों तक बिखरे संचित मूल्य खड़े हैं।
कुर्सी सिंहासन बन बैठी आपस में संबंध लड़े हैं।
कोई किसी का नहीं जगत में अपनी जिद पर सभी अड़े हैं।
लथपथ रक्त रंजिता कब तक भार सहेगी भारत माता,
क्या तुम भूल गए हो भगवन त्रेता से कलयुग का नाता।
उपदेशों से नही सुनेगा मानव अति मगरूरी है
दर्प दूर कर उचित मार्ग दिखलाना बहुत जरूरी है
लोहित हुई दिशाओं को सहलाना बहुत जरूरी है
इसीलिए हे राम धरा पर आना बहुत जरूरी है।
यदि औषधि अनुकूल मिले तो सर्प दंश मिट जाता है
दिनकर की किरणों के आगे तिमिर अंश मिट जाता है
सत्ता के मद से नैतिकता जब अपमानित होती है
तब चाणक्य शिखा खुलती है नंद वंश मिट जाता है।
