मित्रों एक बार की बात है शिव और पार्वती कैलाश पर्वत पर बैठे थे । शिव ध्यान मग्न थे तभी अचानक से पार्वती जी को नारद जी की याद आई। पार्वती जी ने शिव जी की ओर देखते हुए कहा कि आजकल नारद जी का आगमन बहुत कम हो गया है क्या कारण है जो नारद जी ने आपके नाम का जप कम कर दिया या अपने उन्हें अन्य किसी बात पर दण्ड दिया है,,
इस पर शिव जी बोले आप सही कह रही हैं देवी ।
आगे शिव जी कहने लगे नारद मेरे सम्मुख आय और बोले कि प्रभु आप बहुत दयालु है आपकी कृपा सब पर है आप न्याय करता है । मगर प्रभु मैं आपका गुणगान नित्य प्रतिदिन आठों पहर करता हूं आप मुझपर तो ऐसा दयाभाव नहीं दिखाते मुझ पर आप अपनी कृपा नहीं करतें मगर एक किसान जो यदा कदा ही आपका स्मरण करता है आप उससे बहुत प्रसन्न रहते हैं और अपनी दयालुता की बारिश करते रहते हैं ।
शिव जी ने नारद की बात का उत्तर देते हुए कहा मुझे सभी प्राणी एक समान रूप से प्रिय है मेरे लिए न कोई अधिक न कोई कम है। नारद जी ने शिव जी को रोकते हुए कहा कि यदि ऐसा ही है तो जो आपका(शिव जी) स्मरण दिन रात करे वह भी आपको उतना ही प्रिय है जितना कि जो कभी भी आपका स्मरण नहीं करता ।
शिव जी ने कहा महर्षि नारद आप यह कहना चाहते हैं कि आप (नारद) मेरा स्मरण सुबह से लेकर शाम तक करते रहते हैं इसीलिए आप मुझे उस किसान से ज्यादा प्रिय होने चाहिए जो कभी कभी मेरा नाम लेता है ।
नारद जी तपाक से बोले जी भगवन इस पर शिव जी ने कहा एक काम करते हैं आप बोल रहे हो कि आप आठों पहर मेरा नाम स्मरण करते हो तो आप अगले आठ पहर केवल मेरा नाम जप करेंगे , और जो किसान है वह किसानी करेगा । यदि आपने एक क्षण के लिए भी मेरा नाम स्मरण करना रोक दिया तो आपको उस किसान से हार माननी होगी। नारद जी ने शर्त को स्वीकार लिया । और शिव जी के पास से चले गए । अगले आठ पहर नारद जी के लिए परीक्षा की घड़ी थी। इसीलिए उन्होंने नाम जप करना प्रारंभ कर दिया और एकान्तता की तलाश में जंगल की ओर जाने का निर्णय लिया जिससे कि उनके नाम स्मरण में कोई बाधा ना आय। उधर किसान सुबह उठा नित्य कर्म से निवृत होकर हल लेकर खेत पर आ गया ।
एकांत में एक वृक्ष के नीचे बैठे नारद जी नाम जप कर रहे थे तब उन्हें पायलों की मधुर आवाज सुनाई दी धीमे धीमे यह आवाज मानो उनके समीप ही आ रही हो। ज्यों ज्यों यह आवाज पास आती जा रही थी नारद जी को कुछ असहजता महसूस हो रही थी उनके मान में चिंता का बीज अंकुरित होने लगा कही मेरी प्रतिज्ञा भंग न हो जाय । उधर मन कौतूहल कर रहा था आखिर इस निर्जन जंगल में इतनी मधुर आवाज वाली पायल पहने कौन घूम रहा है। नारद जी ने आंखे खोली तो उनके सामने से एक अत्यंत सुंदर स्त्री सर पर पानी का घड़ा लिए और गोद में अपने लालन को उठाए जा रही थी। नारद जी के मन में विचार आया यदि मैं भी सन्यासी जीवन न धारण कर गृहस्थ में होता तो इस निर्जन जंगल में एकांतवास न कर रहा होता।
अब नारद जी नाम स्मरण भूल चुके थे और गृहस्थ जीवन के विचार एक के बाद एक उन्हें मन में आने लगे ।
उधर किसान हल जोतकर जानवरों का चारा लेकर हाल और बैल के साथ घर पहुंचा , स्नान किया और प्रभु के ध्यान में बैठ गया । प्रभु को धन्यवाद कहने के बाद भोजन ग्रहण किया उसके बाद रात्रि विश्राम के लिए चला गया
शिवजी एक दोनों दृश्य देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे।
कुछ देर बाद जब नारद जी ख्यालों से बाहर आए तो उन्हें याद आया कि उनसे तो अनर्थ हो गया है। उनकी प्रतिज्ञा भंग हो गई है ।
फिर भी उन्होंने सोचा कि किसान कौन सा शर्त पूरी कर पाया होगा । तो नारद जी प्रभु का नाम स्मरण करते करते प्रभु के समीप जा पहुंचे । शिव जी नारद को अपने सम्मुख देख मुस्कुराए
अंत में शिव जी ने एक बात कही जो भक्त दैनिक जीवन के कार्य करते हुए पुरुषार्थी जीवन में एक पल के लिए भी मेरा नाम स्मरण कर लेता है अपने मन को इधर उधर नहीं भटकाता ऐसा भक्त उत्तम लोगो की श्रेणी में आता है और अपने ऐसे भक्तों का मैं नाम स्मरण मात्र से ही कल्याण कर देता हूं ।।