🎭 कोई जुगत करो जीने की- अशोक चक्रधर
चौराहे पर हुई लाल बत्ती,
मैंने स्टेयरिंग से हटाई हथेली।
जैसे ही कार का शीशा खोला—
एक आवाज़ आई,
“पचास के पाँच, साहब!”
मैं शीशा चढ़ाने लगा,
तो वो हाथ अंदर बढ़ाने लगा—
“ले लो साहब, चीज़ लाजवाब है।
टिशू पेपर…
मुँह पोंछने का कागज़,
दाम एकदम जायज़ है।
पचास में से मेहनत का
सिर्फ एक रुपया कमाऊंगा,
भीख के वास्ते
रास्ते में हाथ नहीं फैलाऊंगा।”
मैंने सोचा—
बात इसकी सौ फ़ीसदी रॉंग है,
शायद कमाने का कोई नया ढोंग है।
मैं बोला अपने टेलीविजन वाले अंदाज़ में—
“नागरिक ये जान गया है भैया,
माल की क़ीमत है उनन्चास रुपैया!
एक रुपया तुम्हारी जायज़ कमाई,
पर इस जमाने में…
सब हैं नाजायज़ भाई!”
मैंने पूछा—
“अच्छा बताओ,
क्या इनसे पोंछा जा सकता है पसीना?”
उसने हाथ झटके से बाहर निकाला,
सीना तानकर बोला—
“बाबूजी माफ़ करना,
इन कागज़ों से मुमकिन नहीं है
पसीना साफ़ करना।
इनसे पोंछी जाती है लिपस्टिक और क्रीम,
इनसे पोंछी जाती है
मुंह पर लगी आइसक्रीम।
इनसे पोंछे जाते हैं
चॉकलेट के निशान,
इनसे पोंछे जाते हैं
आमलेट के हाथ।
जो इन कागज़ों को खरीद कर ले जाता है—
उसे पसीना ही कहां आता है!”
फिर उसकी आवाज़ गूंज उठी—
“लगता है, आप वाक़िफ नहीं हैं
हिंदुस्तान की ज़मीन से।
यहाँ पसीना पोंछा जाता है
आस्तीन से!
पचास रुपए के पाँच डिब्बे बेचने में
जितना पसीना आएगा—
उसके लिए ये सारा कागज़ कम पड़ जाएगा।
तुम करते बात पसीने की…
अरे कोई जुगत करो जीने की!
पंद्रह दिवस जला चूल्हा,
मेहनत हुई महीने की।
सूरज आया, सुखा न पाया
झिलमिल बूंद पसीने की।
अरे मोल लगाओ, बोली बोलो
इस अनमोल नगीने की…
तुम करते बात पसीने की,
कोई जुगत करो जीने की!”
इतना कहकर उसने जो घूरा—
मैं तो हिल गया पूरा का पूरा।
माथे पर पसीने के कण आ गए महीन-महीन से,
और मैंने वहीं
अपने कुर्ते की आस्तीन से पोंछ डाले।
अरे…
ये तो मुझ मसखरे के साथ मसकरी हो गई।
वो बोला—
“बाबूजी! गाड़ी बढ़ा लो…
बत्ती हरी हो गई।”
