जलाएँ एक दिया हम उन वीरों के नाम - सुदीप भोला

वतन की देहरी के प्रहरी
सो गए नींद  बहुत गहरी
तिरंगा ओढ़ करे वो सोये
वो मीठे सपनों में खोये
न जाने कब से नही किया उन्होने आराम
जलाएँ एक दिया हम उन वीरों के नाम

किसी की आँख के तारे वो
किसी घर के उजियारे वो
किसी को प्राण से प्यारे वो
किसी के राज दुलारे वो
सवेरा सौप के हमको लिखली अपनी शाम
जलाएँ एक दिया हम उन वीरों के नाम

घड़ी दो घड़ी जिये पर युग युग को पर्याप्त हो गए
फूल जो मिले धूल में तो कण कण में व्याप्त हो गए
सलामत देश रहे यह कहते हुए समाप्त हो गए
सफर पर चलते हैं कह वीरगति को प्राप्त हो गए
किसी के सेज बिछौने वो
किसी के स्वप्न  सलौने वो
किसी आँगन के कोने वो
किसी के खेल खिलौने वो
किसी उर्मिला के लाखान और सिया के राम
जलाएँ एक दिया हम उन वीरों के नाम
   
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