श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष -कान्हा से विचित्र मुलाकात || Krishna Janmashtami 2021

कान्हा से विचित्र मुलाकात --





बात उस समय की है जब मुझे कथा क्षेत्र में आए हुए लगभग 8-10 महीने ही हुए थे,

एक रात कथा सुनते सुनते, मैं भाव दशा में चला गया और रोते रोते ही सो गया और शायद सपने की दुनिया में चला गया था, मैंने अपने आप को एक ऐसी दुनिया में पाया, जहां पर दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी, न ही कोई पेड़ पौधे , न ही कोई व्यक्ति, जानवर, मकान, कुछ भी नही ....
मुझे दूर-दूर तक सिर्फ दो ही चीजें दिखाई दे रही थी, ऊपर नीला आसमान और नीचे सफेद नमक जैसी बंजर , दूर- दूर तक, फैली हुई जमीन...

मेरे मन की स्थिति भी उस समय वैसी ही थी, जैसी बाहर की दुनिया दिख रही थी, बिल्कुल वीरान , दूर दूर तक कोई भी अपना महसूस नहीं हो रहा था, ऐसा लग रहा था कि मैं सदियों से अकेला ही हूँ इस दुनियाँ में, दुनिया से बेजार, हारा हुआ.... मेरे मन में , बुद्धि में कोई भी विचार नहीं था, दिमाग बिल्कुल शून्य की अवस्था में था...

उसी विक्षिप्त, बेजार, अकेलेपन की अवस्था में , मैं उस वीराने में बस चले जा रहा था, कहाँ जा रहा हूं , किस लिए जा रहा हूं , मुझे कोई खबर नहीं थी, उस नियतान्त वीराने में बेमकसद चलते चलते अचानक मुझे एक सूखा हुआ पेड़ दिखाई दिया और मैं उस सूखे हुए पेड़ की तरफ चल दिया, उस पेड़ के करीब गया तो मुझे दिखाई दिया कि उस पेड़ पर भी, एक भी पत्ता नहीं था, न ही उस पेड़ के आस पास जमीन पर, चारों तरफ सिर्फ सफेद वीरान धरती थी, मैं और करीब गया तो मुझे दिखाई दिया कि कोई व्यक्ति उस सूखे पेड़ का सहारा लिए बैठा हुआ है और ऊपर नीले आसमान को निहार रहा है, जिज्ञासा बस मैं और करीब गया कि इस वीराने में कौन बैठा है?? जब मैं उस व्यक्ति के और करीब गया , उसका चेहरा देखा तो मेरे अंदर कई सारे भाव एक साथ पैदा हो गए क्योंकि वो व्यक्ति कोई और नही था, बल्कि वह मेरा कान्हा ही था, उस वीराने में बैठा हुवा ...

मुझे बहुत अजीब लगा कि मेरा कान्हा और वह भी इस वीराने में क्यों बैठा है ?? अपने कान्हा को देख कर मेरी आंखों में आंसू आ गए , वह आँसू अपने कान्हा को पहली बार इतने करीब से, देखने की खुशी के भी थे और उन आँसू में आश्चर्य भी था, दुख भी था क्योंकि अपने कान्हा को इस वीराने में बैठा देखकर मुझे दुख भी बहुत हुआ था, और आश्चर्य भी बहुत हो रहा था...

मैंने अपने कान्हा को देखा परंतु कान्हा ने मुझे नहीं देखा, कान्हा एकटक नीले आसमान की तरफ निहार रहा था, कान्हा की वो सूनी आंखें देख कर मुझे बहुत भयंकर दर्द होने लगा,

कान्हा के इस रूप की मैंने जीवन में कभी भी कल्पना नहीं करी थी, इस हाल में अपने कान्हा को मैंने पहली बार महसूस किया था, कान्हा की आंखों में जबरदस्त सूनापन था, नियतान्त अकेलेपन का दर्द ..... कान्हा की वो आंखें और चारों तरफ का मंजर देखकर मेरे अंदर का भयंकर दर्द बढ़ता जा रहा था, उसी भयंकर दर्द की अवस्था में , मैं अपने कान्हा के और करीब चला गया, मैं कान्हा की तरफ एकटक देख रहा था, लेकिन कान्हा, ऊपर नीले आसमान की तरफ मुँह किये हुए बैठा रहा .... उसी भयंकर दर्द में , मैं अपने कान्हा से पूछ बैठा कि

हे कान्हा, तुम इस वीरान जगह में अकेले क्यों बैठे हो ??

तुम्हारी आंखों में इतना सूनापन क्यों है ?? अकेलापन क्यो है ??

ये अकेलापन, सूनापन, वीरानापन तो हम मनुष्यों के भाग्य में होता है , ये सब चीजें आज तुम्हारी आंखों में मुझे क्यों दिखाई दे रहा है??

तुम इस वीराने में क्यों बैठे हो ?? तुम्हें तो पूरी दुनियाँ पूजती है , चाहती है , तुम इतने अकेले क्यों हो ??

मेरी बात सुनकर, कान्हा ने व्यंगात्मक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखा और फिर वापस मुँह घुमाकर नीले आसमान की तरफ देखने लगा

उसने अपनी व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट से मुझे जवाब दे दिया बिना बोले, जो मुझे सुनाई दिया कि

इस दुनियाँ में , कान्हा को कोई नहीं चाहता, लोग मेरे पास आते हैं, सिर्फ और सिर्फ अपनी डिमांड पूरी करने के लिए, मुझे पाने के लिए नहीं ....

Humm, तू भी तो इस अध्यात्म की दुनियां में, कान्हा को पाने के लिये थोड़े ही आया था, मजबूरी में आया था, अपना सपना पूरा करने के लिये आया था ?? .....

ये सब कान्हा ने अपने मुँह से नही कहा था, फिर भी मुझे सुनाई दिया ...

मैं उसके पास, घुटनो के बल बैठा, उसे निहारे जा रहा था और कान्हा फिर से , उस नीले आकाश की तरफ देख रहा था

कुछ समय बाद, कान्हा ने उस नीले आसमान को निहारते हुए ही, एक चाभी निकाली और मेरी तरफ बढ़ा दी ,

मैंने आश्चर्य से पूछा कि हे कान्हा, ये क्या है??

बिना मेरी तरफ देखे, उसने जवाब दिया कि जिसके लिए तू यहां आया है, मुझे खोजते हुए ....

मैं कान्हा से बोला -- मतलब ??

कान्हा बोले, वो देखो, वो सामने ग्लॉस चेंबर में एक मशीन दिख रही है तुम्हें ?? वो इच्छा पूर्ति मशीन है, ये चाभी उसी मशीन की है, ये चाभी लो , उस मशीन के पास जाओ , उस मशीन में लगाओ और जो कुछ भी पाना चाहते हो, उस मशीन में फीड करो , लिखो , वो सारी इच्छाए पूरी हो जाएगी तुम्हारी...

ये इच्छापूर्ति मशीन की चाभी मेरे पास है, इसीलिए लोग मुझे पूजते हैं , मानते हैं , ढूंढते है, मेरे पास आते हैं वरना इस कान्हा की, इस दुनिया में कोई कीमत नहीं

यह बोलकर कान्हा ने वह चाबी मेरे हाथों में थमा दी और फिर वापस उस नीले आसमान की तरफ निहारने लगा,

मैं अपने हाथ में वो चाभी लिए हुए, वहीं कृष्ण के पास बैठा रहा और कान्हा को निहारे जा रहा था

कान्हा की वो सुनी आंखें, वो चेहरा, एकटक देखे जा रहा था,

वो चेहरा, वो आंखें , देख कर, कान्हा के अंदर का सूनापन महसूस करके, एक भूचाल सा मचा था मेरे अंदर .... जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता....

जिस कान्हा को मैंने उम्र भर चाहा, वह कान्हा आज मेरे सामने बैठा था, उससे मिलने की खुशी भी थी मेरे अंदर

परंतु उससे कई गुना, हजार गुना, भीषण दर्द भी था, अपने कान्हा को इस हाल में देखकर...

मैं बहुत अजीब स्थिति में था, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मेरी आंखों से सिर्फ जार जार आंसू गिर रहे थे, अपने कान्हा को इस हाल में देखकर ....

मैंने अपने पूरे जीवन काल में इतना दर्द कभी महसूस नहीं किया था, जो दर्द मुझे आज हो रहा था, अपने कान्हा को इस हाल में देखकर...

मेरे हाथ मे वो चाभी थी, परन्तु मैं अपनी जगह से हिल भी नही पा रहा था, सिर्फ रोये जा रहा था और अपने कान्हा को देखे जा रहा था

उसी भाव दशा में , बहुत मुश्किल से , मैं बोल पाया कि

हे कान्हा, इतने सालों बाद आज तुम मुझे मिले हो ...

क्या मैं तुम्हें छू सकता हूं ??

क्या मैं तुम्हें गले लगा सकता हूं ??

कान्हा ने मुझे देखे बगैर, उसी नीले आसमान की तरफ निहारते हुए बोल दिया कि..

नहीं ...

ये संभव नहीं है..

नहीं शब्द सुनते ही .....

मैं जोर जोर से, फूट-फूट कर रोने लगा और फूट-फूट कर रोते हुए ही मैं बोलता चला गया ....

हाँ कान्हा , तुम सही कह रहे हो , मनोज साहनी की औकात ही क्या है ?? जो तुम्हें छू सके ??? तुम्हें इतने करीब पाकर मनोज सहानी पागल हो गया था, बांवरा हो गया था, अपनी औकात भूल गया था...

दुनियाँ सही कहती है, खाली चाहने से क्या होता है ??? तुम्हे पाने के लिये तो कई जन्मों के पुण्य कर्म चाहिये ?? तपस्या चाहिये ??

कहाँ तुम कान्हा ...
पवित्रता के सर्वोच्च शिखर पर ...

और मैं पाप कर्मों के गर्त में, मेरे जैसा महापापी व्यक्ति, तुम्हे कैसे छू सकता है ???

हे कान्हा, तुम्हे छूने के लिये , ये पापी मनोज साहनी कहाँ से पुण्य ले कर आये ?? जिसने अपने पूरे जीवन काल मे सिर्फ पाप कर्म ही किये है ....

सिर्फ निंदा, लोगो पर दोषारोपण, बहस, चीखना चिल्लाना, गुस्साना, यही कमाया है, कभी किसी को दो मीठे बोल, मुस्कुराहट तक नही दिया

आज मेरे पास इस आँसुवो के सिवा कुछ भी नही ....

ये दुनियाँ सही कहती थी, मैं तो उस विचित्र साधु की बातों में आ गया कि कान्हा सिर्फ प्रेम अश्रु से मिल जाता है, भाग्य से नही, पुण्यों से नही ....

हे कान्हा
उस विचित्र साधु के वचन सुन कर ही, मैं अपनी औकात भूल गया, और तुम्हे छूने की लालसा कर बैठा

आज तेरे इंकार ने, उस विचित्र साधु को झूठा साबित कर दिया और इस दुनियाँ को सही साबित कर दिया .. और फिर मैं बिखर के, फूट फूट कर रोने लगा ....

मेरी हालत देखकर, कान्हा भी विचलित हो गया, उसकी आँखें भी भीग गयी, मेरी तरफ मुड़ कर, मुझे चुप कराने के लिये , उसने अपना हाथ बढ़ाया फिर वापस खिंच लिया, और जमीन पर मुट्ठी से मारा, उसकी इस क्रिया से साफ छलक गया कि वो मेरी हालत देखकर बेचैन भी है, और मजबूर भी, उसी मजबूरी के कारण उसने, मेरी तरफ बढ़ाया हुवा खिंच लिया और मजबूरी के गुस्से में जमीन पर दे मारा ...

जो कुछ मैं देख रहा था, बार बार मेरा आश्चर्य बढ़ रहा था, मुझे बहुत अजीब लग रहा था

कान्हा भीगी आँखों से बोले -- नही बेटा, वो विचित्र साधु ही सत्य है, वरना इस वीराने में बैठे हुए कृष्ण तक , तू कभी नही पहुँच पाता, ये मुलाकात कभी नही होती ...

मैंने तुझे छूने से मना कर दिया, क्योकि मैं अपने प्रेम के हाथों मजबूर हूँ,

न ही तू मुझे छू सकता है, न ही मैं तुझे छू सकता हूँ, ये कठोर नियति है ....

तुझे इजाजत दे कर, मैं तेरा सर्वोच्च नुकसान नही कर सकता हूँ ... मै मजबूर हूँ, मेरा प्रेम इसकी इजाजत नही देता ...

तुझसे मिलने की चाहत में, मैं एक गुनाह पहले ही कर चुका हूं , तुझसे मिलने के लिये ही मैने तुझे मजबूर किया था, इस अध्यात्म छेत्र में आने के लिये, कथा श्रवण छेत्र में आने के लिये ...

कान्हा कुछ मुँह से बोल रहा था, कुछ आँसुवो से, दिल से, जो मुझे सुनाई दिया ...

कान्हा -- मेरी मोहब्बत की यही दास्तान है ...
जिसे टूट कर चाहा ,
उसे खबर ही नही ...

बेटा, तुझे अपने आँसुवो की तो खबर है, पर मेरी तड़प, मेरे आँसू नही दिखाई दिए तुझे ....

जा बेटा, वो चाभी ले, उस मशीन पर जा, और जो कुछ भी पाना चाहता है, ले ले, तुझसे मिल लिया, ये मुलाकात हो गयी, तू मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक आ गया, यही बहुत है कान्हा के लिये ... और फिर कान्हा ने मुँह घुमा लिया, सायद वो अपने आँसू छिपा रहा था मुझसे ....

कान्हा भी मुझे टूट कर चाहता है ??

कुछ पल तो मुझे यकीन ही नही हो रहा था, अपने कानों पर, आँखों पर .....

मेरा कान्हा, मुझ जैसे मामूली इंसान को चाहता है ??

वो अपार खुशी का अहसास बहुत विचित्र था... सब्दो में बयां नही कर सकता ...

जब कान्हा ने नही शब्द कहा था तो मैं फूट फूट कर रोने लगा था, अतिसय ग्लानि के दर्द से, दुख से ...

और ये जानकर कि कान्हा भी मुझसे टूट कर प्यार करता है, मुझसे मिलने के लिये ही वो मुझे अध्यात्म छेत्र में लाया, तो मैं अपार खुशी में रोने लगा ....

बहुत अजीबोगरीब भाव बार बार बदल रहे थे, उसे सब्दो में कैसे बयां करू ???

क्योकि मैं जान गया था कि कान्हा भी मुझे अतिसय प्रेम करता है तो मैं थोड़ा वात्सल्य वाले आग्रह पर चला गया ...और पूछ बैठा कि कान्हा, ऐसी क्या मजबूरी है ??? वो भी तुम्हे ?? जिसके संकल्प मात्र से इस सृष्टि का निर्माण हुवा है ....

बिना मेरी तरफ देखे, अपने प्रेम विरह के आँसू मुझसे छुपाते हुए , कान्हा बोला -- बेटा, इस अध्यात्म जगत में एक साल गुजारने के बाद, एक चीज तो तुझे पता ही चल गई है कि इस अस्तित्व के बहुत सारे सत्य सार्वजनिक तौर पर सभी को नही बताए जाते है,
Hmm ...
उसमे एक सत्य ये भी है, जब इस सृष्टि का निर्माण हुवा, ये इक्छापूर्ती मशीन बनाते समय, एक manufacturer defect हो गया है इस मशीन में, जिसके कारण इसके सॉफ्टवेयर में एक प्रोग्राम चला गया है कि जो भी व्यक्ति मुझे छुवेगा या मैं किसी व्यक्ति को गले लगा लू तो उसके बाद ये मशीन , उस व्यक्ति का नाम, चेतना नम्बर कभी स्वीकार ही नही करेगी, यानी मैं चाहू तो भी उस व्यक्ति की , कोई भी इक्छा , कभी भी पूरी नही कर पाउँगा ... इसीलिए मैंने मना कर दिया तुझे, छूने के लिए....तुझे छूने की इजाजत दे कर , मैं तेरा सर्वोच्च नुकसान नही कर सकता...

कान्हा की प्रेम बेबसी देख कर, सुन कर, वो चेहरा, वो मंजर .....मैं आँसू सहित थोड़ा वात्सल्य जिद्द में बोला -- कुछ भी हो कान्हा, मुझे तो गले लगना है, (थोड़ा जिद्द भी था उसका प्रेम जानकर, परन्तु एक संकोच भी था कि मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति उसे कैसे छुए , बिना इजाजत)

कान्हा बोला , नही हो सकता ये ...

मेरा बच्चे वाला जिद्द थोड़ा और बढ़ गया, जिद्द करते हुए, तेज रोते हुए , सुबकते हुए , बार बार बोलने लगा कि नही, मुझे तो मिलना है तुझे, गले लगाना है ...

वो मना कर रहा था,
मैं जिद्द में रो रहा ...
अचानक .... उसकी प्रेम बेबसी ने गुस्से का रूप धारण कर लिया और सजल नेत्र, गुस्से की वाणी में, खीज कर बोला -- भाव मे आकर मूर्ख न बन, मेरी बात मान ले, तुझे गले लगाने की इजाजत दे कर, मैं तेरा सर्वोच्च नुकसान नही कर सकता, अभी तू बहुत भाव दशा में है, इसीलिए मुझे गले लगाने की जिद्द कर रहा है, यदि मुझे गले लगा लिया तो जीवन भर पछतायेगा, सिर्फ इसी जन्म में ही नही बल्कि जन्मों जन्मों तक तेरी कोई भी इक्छा पूरी नही होगी, जा बेटा, उस इक्छापूर्ती मशीन पर जा , और जो कुछ पाना चाहता है ले ले ...मुझे गले लगाएगा तो तेरा सपना भी कभी पूरा नही होगा, मैने देखा है तुझे सालो तक रोते हुए , अपना सपना पूरा करने के लिये, जिस सपने को पूरा करने के लिये तूने सब कुछ खो दिया, कितनी निंदा, ताने, अपमान सहा, कभी अपनी जिंदगी जी ही नही पाया, बचपन से ही सिर्फ सपना सपना करता आया, कितना रोया उसके लिये, उस सपने को पूरा करने के लिये तूने इस समाज मे अपने आप को नपुंसक भी घोषित कर दिया, सब कुछ खो दिया जिस सपने के लिये, मैं जानता हूं कि तू पूरी उम्र सिर्फ उसी सपने को पूरा करने के लिये ही जिया है, उसी सपने को पूरा करने के लिये मरने को तैयार था, मैं जानता हूं कि तू उस सपने के बिना जी नही पायेगा, जा बेटा, अपना सपना पूरा कर ले, अपने भाग्य में लिखी लिखावट को बदल लें ...... मुझे गले लगाने की जिद्द न कर , भाव मे आकर मूर्ख न बन, यदि तूने मुझे गले लगाया तो तू कितना भी चीखेगा, चिल्लायेगा, फिर भी मैं तेरा कोई दर्द दूर नही कर पाउँगा, तेरी कोई भी इक्छा पूरी नही कर पाउँगा, सिर्फ इसी जन्म नही, बल्कि जन्मों जन्मों तक......... तू कई बार मेरे पास आया, रोया, चीखा , चिल्लाया कि हे कान्हा, या तो तू मुझसे मेरा ये shoft दिल वापस ले ले, नही तो मुझे कोई शक्ति, शिद्धि दो, ताकत दो, ताकि मैं लोगो की तकलीफ , दर्द दूर कर सकू .... क्योकि जब भी तू किसी की तकलीफ, समस्या देखता था, उसके लिये कुछ नही कर पाता था , तो हर बार मेरे पास आकर रोने लगता था .... जा बेटा, अपनी सब इक्छा पूरी कर ले, जो भी शक्ति पाना चाहता हो , उस मशीन में भर ले, पूरी कर ले, जा इस दुनियां की जितनी सेवा करनी हो , कर ले ... जा कर ले कुछ ऐसा, जिसे ये दुनिया सालो तक तुझे याद करे...मुझे गले लगाने की मूर्खता न कर ....

कान्हा के शब्द सुनकर, उसकी प्रेम बेबसी के आँसू, गुस्सा देखकर, मैं बिफर गया ...... और रोते हुए बोला -- कान्हा  तुझे गले लगाना यदि मेरी मूर्खता है, तो मैं महामूर्ख बनने को राजी हु, आज तुम प्रेम बेबसी की जंजीर में बंधे हो कान्हा , मैं नही ......

अपने प्रेम के हाथों मजबूर होकर, तुम मुझे गले नही लगा सकते हो , तो मैं भी अपने प्रेम के हाथों मजबूर, तुझे इस हाल में छोड़कर नही जा सकता हूँ ....

क्या होगा कान्हा ??
तुम मेरी कोई इक्छा पूरी नही कर पावोगे कभी भी ?? ठीक है, पूरी उम्र, सभी जनम, मुझे रोना मंजूर है, लेकिन तुझे इस हाल में छोड़ कर जाना मंजूर नही ... और इतना बोलते बोलते हुए ही, मैं दौड़ पड़ा कान्हा को गले लगाने को, कान्हा संकोच वश थोड़ा पीछे की तरफ खिसका, परन्तु मैं जबरन कान्हा के गले लग कर रोने लगा ......उसे गले लगाना .....गजब का अहसास था.....वो सुकून, वो शांति ........उसमे पूरा खो गया...कुछ पल के बाद, कान्हा ने प्यार से, मेरे गाल पर, अपने हाथ से थपकी देते हुए, आँसू सहित मुस्कुराते हुए कहा कि  सही में तू बहुत जिद्दी है, ये कृष्ण , पूरे संसार की इक्छा को पूरा करता है और आज तूने इस कृष्ण की इक्छा को पूरा कर दिया ......मैं कान्हा की बात को अनसुना करते हुए , उसे और कसके पकड़ते हुए बोला -- कान्हा, अब कुछ बोलो नही .... मुझे आज इस अहसास को पूरा पी लेने दो, इस एक लम्हे में , पूरी जिंदगी जी लेने दो, बहुत मुद्दतो के बाद पाया है तुम्हे ....सब्दो से इस अहसास को धूमिल न करो ....
(लग जा गले....ये हंसी रात हो न हो ....सायद इस जनम में ,,, फिर मुलाकात हो न हो .....लग जा गले....)

और फिर हम दोनों, एक दूसरे के गले लगे हुए, उस अहसास में खो गए ...सो गए ....

उस मुलाकात के बाद से, मेरी प्रार्थना , पुकार की रीत ही बदल गयी, इंसान होने के नाते , मुझे अपने परिवार के सदस्यों का , लोगो का कष्ट महसूस होता था, तो मैं सिर्फ रो लेता था, कान्हा को जल्दी बुलाता भी नही था, कभी कभी तेज दर्द में कान्हा की पुकार निकल जाये तो इतना ही कह पाता था कि कान्हा, यार देख लेना उस केस को भी, तुम मेरे लिये भगवान का रोल अदा नही कर सकते हो, परन्तु उस इंसान के लिये तो कर ही सकते हो ....

उस घटना, उस मुलाकात के बाद, कान्हा से कुछ भी मांगना , मेरा बन्द हो गया....क्योकि मेरा प्रेम इसकी इजाजत नही देता था, क्योकि मैं जानता था कि अब कान्हा मेरी कोई भी इक्छा पूरी नही कर सकता है, अगर गलती से भी , दर्द में आँसू के साथ , कोई इक्छा मन मे आयी और कान्हा को पता चला तो कान्हा को फिर से अपनी बेबसी का दर्द होगा, संकोच होगा और कुछ भी हो जाय, मैं अपने कान्हा को वो बेबसी का दर्द नही दे सकता था .......

ये प्रेम नगर की दुनिया बहुत विचित्र है .....
ऐ मेरे मालिक,
एक तू रहे ...
तेरी रज़ा रहे,
मैं न रहूँ ...
मेरी आरजू न रहे ......

सिर्फ तू ही तू ......तू ही तू .....और तू ही तू .......

कान्हा प्रिय हो
प्रेम प्रिय हो



श्रीकृष्ण जन्माष्टमी


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