कवि सुदीप भोला द्वारा रचित परोडी गीत : रुपया गिरा ढै वायदे के कारोवार में


रुपया गिरा  ढै वायदे के कारोवार में 
रुपया गिरा ढै पूंजीवादी  बाजार में
रुपया गिरा रुपया गिरा रुपया गिरा ढै ...ढै.. ढै..ढै 
जैसे टपके छत गरीब की ऐसे रुपया टपका
गीला गीला ढीला ढीला आज अधर में लटका
झटक गया खुद देते देते मंहगाई का झटका-2
डॉलर का भेजा सटका तो उठा उठा के पटका
फिर क्या हुआ........
phirrrrrrrrrrrrr........
फिर रुपया बोला टै महगाई के उपचार में

लोकतंत्र का मंदिर लगता जैसे प्रेशर कूकर
भीतर भीतर खिचड़ी  पकती  सीटी बजती  ऊपर
छौकतंत्र  का घी  सब पी गये अर्थशास्त्र के लूज़र
और विदेशो में हम नौकर चला रहे कंप्यूटर 
फिर क्या हुआ........
phirrrrrrrrrrrrr........
फिर रुपया बोला टै यह खबर छपी  अखबार में
रुपया गिरा  ढै वायदे के कारोवार में 
रुपया गिरा ढै पूंजीवादी  बाजार में

                                                                                  --- सुदीप भोला


YouTube लिंक: https://youtu.be/BpSQ4RpyjZo?t=3m32s
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